मूल श्लोक
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
devadvijaguruprājñapūjanaṃ śaucamārjavam brahmacaryamahiṃsā ca śārīraṃ tapa ucyate
अनुवाद
देवता, ब्राह्मण, गुरु और विद्वानों की पूजा, शुद्धता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा को शारीर अर्थात् कायिक तप कहते हैं।