मूल श्लोक
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
abhisandhāya tu phalaṃ dambhārthamapi caiva yat ijyate bharataśreṣṭha taṃ yajñaṃ viddhi rājasam
अनुवाद
परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! उसको राजस यज्ञ समझो कि जो फल की इच्छा से अथवा दम्भ के हेतु अर्थात् ऐश्वर्य दिखलाने के लिए किया जाता है।