मूल श्लोक
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टोय इज्यते ।यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
aphalākāṅkṣibhiryajño vidhidṛṣṭoya ijyate yaṣṭavyameveti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ
अनुवाद
फलाशा का आकांक्षा छोड़ कर अपना कर्तव्य समझ करके शास्त्र की विधि के अनुसार, शान्त चित्त से जो यज्ञ किया जाता है वह सात्त्विक यज्ञ है।