मूल श्लोक
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
asatyamapratiṣṭhaṃ te jagadāhuranīśvaram aparasparasaṃbhūtaṃ kimanyatkāmahaitukam
अनुवाद
ये (आसुर लोग) कहते है कि सारा जगत अ-सत्य है, अ-प्रतिष्ठ अर्थात् निराधार है, अनीश्वर यानी बिना परमेश्वर का है, अ-परस्परसम्भूत अर्थात् एक दूसरे के बिना ही हुआ है, (अतएव काम को छोड़ अर्थात् मनुष्य की विषय-वासना के अतिरिक्त इसका और क्या हेतु हो सकता है?
टिप्पणी
यद्यपि इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है, तथापि इसके पदों का अर्थ करने में कुछ मतभेद है। हम समझते है कि यह वर्णन उन चार्वाक आदि नास्ति कों के मतों का है, कि जो वेदान्तशास्त्र या कापिल सांख्यशास्त्र के सृष्टि -रचनाविषयक सिद्धान्तों को नहीं मानते, और यही कारण है कि इस श्लोक के पदों का अर्थ सांख्य और अध्यात्मशास्त्रीय सिद्धान्तों के विरुद्ध है। जगत को नाशवान समझ कर वेदान्ती उसके अविनाशी सत्य को –सत्यस्य सत्य (वृ.2.3.6) – खोजता है, और उसी सत्य तत्त्व को जगत का मूल आधार या प्रतिष्ठा मानता है – ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा (तै॰ 2.5)। परन्तु आसुरी लोग कहते है, कि यह जग अ-सत्य है, अर्थात् इसमें सत्य नहीं है; और उसी लिए वे इस जगत को अ-प्रतिष्ठ भी कहते है, अर्थात् इसकी न प्रतिष्ठा है और न आधार। यहाँ शंका हो सकती है, कि इस प्रकार अध्यात्मशास्त्र में प्रतिपादित अव्यक्त परब्रह्म यदि आसुरी लोगों को सम्मत न हो, तो उन्हें भक्ति मार्ग का व्यक्त ईश्वर मान्य होगा। इसी से अनीश्वर (अन् + ईश्वर) पद का प्रयोग करके कह दिया है, कि आसुरी लोग जगत में ईश्वर को भी नहीं मानते। इस प्रकार जगत का कोई मूल आधार न मानने से उपनिषदों में वर्णित यह सृष्ट्युत्पत्ति-क्रम छोड़ देना पड़ता है, कि 'आत्मनः आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः । अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्यः अन्नं। अन्नात्पुरुषः।' (तै॰ 2.1); और सांख्यशास्त्रोक्त इस सृष्ट्युत्पत्ति-क्रम को भी छोड़ देना पड़ता है कि प्रकृति और पुरुष, ये दो स्वतन्त्र मूल तत्त्व है एवं सत्त्व, रज और तम गुणों के अन्योन्य आश्रय से अर्थात् परस्पर मिश्रण से सब व्यक्त पदार्थ उत्पन्न हुए हैं। क्योंकि यदि इस शृंखला या परम्परा को मान ले, तो दृश्य-सृष्टि के पदार्थों से इस जगत का कुछ न कुछ मूल तत्त्व मानना पड़ेगा। इसी से आसुरी लोग जग के पदार्थों को अ-परस्पर-सम्भूत मानते हैं, अर्थात् वे यह नहीं मानते कि ये पदार्थ एक दूसरे से किसी क्रम से उत्पन्न हुए हैं। जगत की रचना के सम्बन्ध में एक बार ऐसी समझ हो जाने पर मनुष्य प्राणी ही प्रधान निश्चित हो जाता है, और फिर यह विचार आप ही आप हो जाता है कि मनुष्य की काम-वासना को तृप्त करने के लिए ही जगत के सारे पदार्थ बने है, उनका और कुछ उपयोग नहीं है। और यही अर्थ इस श्लोक के अन्त में 'कि मन्यत्कामहैतुकम्' – काम को छोड़ उसका और क्या हेतु होगा? – इन शब्दों से, एवं आगे के श्लोकों मे भी वर्णित है। कुछ टीकाकार 'अपरस्परसम्भूत' पद का अन्वय 'कि मन्यत्' से लगाकर यह अर्थ करते हैं कि 'क्या ऐसा भी कुछ देख पड़ता है जो परस्पर अर्थात् स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न न हुआ हो? नहीं; और जब ऐसा पदार्थ ही नहीं देख पड़ता तब यह जगत कामहेतुक अर्थात् स्त्री-पुरुष की कामेच्छा से ही निर्मित हुआ है।' एवं कुछ लोग 'अपरश्च परश्च अपरस्परौ' ऐसा अद्भुत विग्रह करके इन पदों का यह अर्थ लगाया करते है कि 'अपरस्पर' ही स्त्री-पुरुष हैं, इन्हीं से यह जगत उत्पन्न हुआ है, इसलिए स्त्री-पुरुषों का काम ही इसका हेतु है और कोई कारण नहीं है। परन्तु यह अन्वय सरल नहीं है और 'अपरश्च परश्च' का समास 'अपर-पर' होगा; बीच में सकार न आने पावेगा। इसके अतिरिक्त अ-सत्य और अ-प्रतिष्ठ इन पहले आए हुए पदों को देखने से यही ज्ञात होता है कि अ-परस्परसम्भूत नञ्समास ही होना चाहिए; और फिर कहना पड़ता है कि सांख्यशास्त्र में 'परस्परसम्भूत' शब्द से जो 'गुणों से गुणों का अन्योन्य जनन' वर्णित है, वही यहाँ विवक्षित है (देखो गीतारहस्य पृ.151 और 159)। 'अन्योन्य' और 'परस्पर' दोनों शब्द समानार्थक हैं, सांख्यशास्त्र में गुणों के पारस्परिक झगड़े का वर्णन करते समय ये दोनों शब्द आते हैं (देखो मभा॰ शां॰ 305; सां॰ का॰ 12 और 13)। गीता पर जो माध्वभाष्य है, उसमें इसी अर्थ को मानकर, यह दिखलाने के लिए कि जगत की वस्तुएँ एक दूसरी से कैसे उपजती है, गीता का यही श्लोक दिया गया है - 'अन्नाद्भवन्ति भूतानि' इत्यादि – (अग्नि मे छोड़ी हुई आहुति सूर्य को पहुँचती है, अतः) यज्ञ से वृष्टि , वृष्टि से अन्न, और अन्न से प्रजा उत्पन्न होती है (देखो गी॰ 3.14 और मनु॰ 3.76)। परन्तु तैत्तिरीय उपनिषद् का वचन इसकी अपेक्षा अधिक प्राचीन और व्यापक है, इस कारण उसी को हमने ऊपर प्रमाण में दिया है। तथापि हमारा मत है, कि गीता के इस 'अ-परस्परसम्भूत' पद से उपनिषद के सृष्ट्युत्पत्ति-क्रम की अपेक्षा सांख्यों का सृष्ट्युत्पत्ति-क्रम ही अधिक विवक्षित है। जगत की रचना के विषय में ऊपर जो आसुरी मत बतलाया गया है, उसका इन लोगों के बर्ताव पर जो प्रभाव पड़ता है, उसका वर्णन करते है। ऊपर के श्लोक में, अन्त में, जो 'कामहैतुकं' पद है उसी का यह अधिक स्पष्टीकरण है।
— Lokmanya Tilak