मूल श्लोक
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
dvau bhūtasargau loke'smindaiva āsura eva ca daivo vistaraśaḥ prokta āsuraṃ pārtha me śṛṇu
अनुवाद
इस लोक में दो प्रकार के प्राणी उत्पन्न हुआ करते है; (एक) दैव और दूसरे आसुर। (इनमें) दैव (श्रेणी का) वर्णन विस्तार से कर दिया; (अब) हे पार्थ! मैं आसुर (श्रेणी का) वर्णन करता हूँ, सुन।
टिप्पणी
पिछले अध्यायों में यह बतलाया गया है, कि कर्मयोगी कैसा बर्ताव करें और ब्राह्मी अवस्था कैसी होती है या स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त अथवा त्रिगुणातीत किसे कहना चाहिए; और यह भी बतलाया गया है कि ज्ञान क्या है। इस अध्याय के पहले तीन श्लोकों में दैवी सम्पत्ति का जो लक्षण है, वही दैव-प्रकृति के पुरुष का वर्णन है; इसी से कहा है, कि दैव श्रेणी का वर्णन विस्तार से पहले कर चुके है। आसुर सम्पत्ति का थोड़ा सा उल्लेख नवें अध्याय (9.11 और 12) में आ चुका है; परन्तु वहाँ का वर्णन अधूरा रह गया है, इस कारण इस अध्याय में उसी को पूरा करते है–
— Lokmanya Tilak