भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १६.६ ·

English

मूल श्लोक

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

dvau bhūtasargau loke'smindaiva āsura eva ca daivo vistaraśaḥ prokta āsuraṃ pārtha me śṛṇu

१६.६अध्याय १६ · दैवासुरसम्पद्विभागयोग२४ में से श्लोक ६

अनुवाद

इस लोक में दो प्रकार के प्राणी उत्पन्न हुआ करते है; (एक) दैव और दूसरे आसुर। (इनमें) दैव (श्रेणी का) वर्णन विस्तार से कर दिया; (अब) हे पार्थ! मैं आसुर (श्रेणी का) वर्णन करता हूँ, सुन।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

पिछले अध्यायों में यह बतलाया गया है, कि कर्मयोगी कैसा बर्ताव करें और ब्राह्मी अवस्था कैसी होती है या स्थितप्रज्ञ, भगवद्भक्त अथवा त्रिगुणातीत किसे कहना चाहिए; और यह भी बतलाया गया है कि ज्ञान क्या है। इस अध्याय के पहले तीन श्लोकों में दैवी सम्पत्ति का जो लक्षण है, वही दैव-प्रकृति के पुरुष का वर्णन है; इसी से कहा है, कि दैव श्रेणी का वर्णन विस्तार से पहले कर चुके है। आसुर सम्पत्ति का थोड़ा सा उल्लेख नवें अध्याय (9.11 और 12) में आ चुका है; परन्तु वहाँ का वर्णन अधूरा रह गया है, इस कारण इस अध्याय में उसी को पूरा करते है–

— Lokmanya Tilak

अध्याय १६, श्लोक १६.६