भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १६.५ ·

English

मूल श्लोक

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

daivī sampadvimokṣāya nibandhāyāsurī matā mā śucaḥ sampadaṃ daivīmabhijāto'si pāṇḍava

१६.५अध्याय १६ · दैवासुरसम्पद्विभागयोग२४ में से श्लोक ५

अनुवाद

(इनमें से) दैवी सम्पत्ति (परिणाम में) मोक्ष-दायक और आसुरी बन्धनदायक मानी जाती है। हे पाण्डव! तू दैवी सम्पत्ति में जन्मा हुआ है। शोक मत कर।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

संक्षेप में यह बतला दिया कि इन दो प्रकार के पुरुषों को कौन-सी गति मिलती है; अब विस्तार से आसुरी पुरुषों का वर्णन करते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १६, श्लोक १६.५