मूल श्लोक
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇameva ca adhiṣṭhāya manaścāyaṃ viṣayānupasevate
अनुवाद
कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन में ठहर कर यह (जीव) विषयों को भोगता है।
टिप्पणी
इन तीन श्लोकों में से, पहले में यह बतलाया है, कि सूक्ष्म या लिंग शरीर क्या है; फिर इन तीन अवस्थाओं का वर्णन किया है कि लिंग-शरीर, स्थूल देह में कैसे प्रवेश करता है, वह उससे बाहर कैसे निकलता है, और उसमें रह कर विषयों का उपभोग कैसे करता है। सांख्य-मत के अनुसार यह सूक्ष्म शरीर महान तत्त्व से लेकर सूक्ष्म पंचतन्मात्राओं तक के अठारह तत्त्वों से बनता है; और वेदान्तसूत्रों (3.1.1) में कहा है, कि पंच सूक्ष्मभूतों का और प्राण का भी उसमें समावेश होता है (देखो गीतार॰ पृ. 187 – 191)। मैत्र्युपनिषद् (6.10) में वर्णन है कि सूक्ष्मशरीर अठारह तत्त्वों से बनता है। इससे कहना पड़ता है कि 'मन और पाँच इन्द्रियाँ' इन शब्दों से सूक्ष्मशरीर में वर्तमान दूसरे तत्त्वों का संग्रह भी यहाँ अभिप्रेत है। वेदान्तसूत्रों (3.17 और 43) में भी 'नित्य' और 'अंश' दो पदों का उपयोग करके ही यह सिद्धान्त बतलाया है कि जीवात्मा परमेश्वर से बारंबार नए सिरे से उत्पन्न नहीं हुआ करता, वह परमेश्वर का 'सनातन अंश' है (देखो गी॰ 2.24)। गीता के तेरहवें अध्याय (13.4) में जो यह कहा है कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार ब्रह्मसूत्रों से लिया गया है, उसका इससे दृढीकरण हो जाता है (देखो गीतार॰ परि॰ पृ. 537 – 538)। गीतारहस्य के नवें प्रकरण (पृ. 246) में दिखलाया है कि 'अंश' शब्द का अर्थ 'घटकाशादि'वत् अंश समझना चाहिए, न कि खंडित 'अंश'। इस प्रकार शरीर को धारण करना, उसका छोड़ देना, एवं उपभोग करना – इन तीनों क्रियाओं के जारी रहने पर –
— Lokmanya Tilak