मूल श्लोक
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
na rūpamasyeha tathopalabhyate nānto na cādirna ca saṃpratiṣṭhā aśvatthamenaṃ suvirūḍhamūlamasaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā
अनुवाद
परन्तु इस लोक में (जैसा कि ऊपर वर्णन किया है) वैसा उसका स्वरूप उपलब्ध नहीं होता; अथवा अन्त, आदि और आधारस्थान भी नहीं मिलता। अत्यन्त गहरी जड़ों वाले इस अश्वत्थ (वृक्ष) को अनासक्ति रूप सुदृढ़ तलवार से काट कर,