भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १५.४ ·

English

मूल श्लोक

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्येयतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

tataḥ padaṃ tatparimārgitavyam yasmingatā na nivartanti bhūyaḥ tameva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī

१५.४अध्याय १५ · पुरुषोत्तमयोग२० में से श्लोक ४

अनुवाद

फिर उस स्थान को ढूँढ निकालना चाहिए कि जहाँ जाने से फिर लौटना नहीं पड़ता; और यह संकल्प करना चाहिए कि (सृष्टि -क्रम की यह) 'पुरातन प्रवृत्ति जिससे उत्पन्न हुई है, उसी आद्य पुरुष की ओर मैं जाता हूँ।'

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

गीतारहस्य के दसवें प्रकरण में विवेचन किया है, कि सृष्टि का फैलाव ही नाम-रूपात्मक कर्म है और यह कर्म अनादि है; आसक्ति -बुद्धि छोड़ देने से इसका क्षय हो जाता है, और किसी भी उपाय से इसका क्षय नहीं होता; क्योंकि यह स्वरूपतः अनादि और अव्यय है (देखो पृ. 285 – 286)। तीसरे श्लोक के 'उसका स्वरूप या आदि-अन्त नहीं मिलता' इन शब्दों से यही सिद्धान्त व्यक्त किया गया है कि कर्म अनादि है; और आगे चल कर इस कर्मवृक्ष का क्षय करने के लिए एक अनासक्ति ही को साधन बतलाया है; ऐसे ही उपासना करते समय जो भावना मन में रहती है, उसी के अनुसार आगे फल मिलता है (गी॰ 8.6)। अतएव चौथे श्लोक में स्पष्ट कर दिया है, कि वृक्ष-छेदन की यह क्रिया होते समय मन में कौन-सी भावना रहनी चाहिए। शांकरभाष्य में 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' पाठ है, इससे वर्तमानकाल प्रथम पुरुष के एकवचन का 'प्रपद्ये' क्रियापद है, जिससे यह अर्थ करना पड़ता है; और इसमें 'इति' सरीखे किसी न किसी पद का अध्याहार भी करनी पड़ता है। इस कठिनाई को काट डालने के लिए रामानुजभाष्य में लिखित 'त्मेव चाद्यं पुरषं प्रपद्येद्यतः प्रवृत्तिः' पाठान्तर को स्वीकार कर लें तो ऐसा अर्थ किया जा सकेगा, कि 'जहाँ जाने पर फिर पीछे नहीं लौटना पड़ता, उस स्थान को खोजना चाहिए, (और) जिससे सब सृष्टि की उत्पत्ति हुई है, उसी में मिल जाना चाहिए।' किन्तु 'प्रपद' धातु है नित्य आत्मनेपदी, इससे उसका विध्यर्थक अन्य पुरुष का रूप 'प्रपद्येत्' हो नहीं सकता। 'प्रपद्येत्' परस्मैपद का रूप है और वह व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है। प्रायः इसी कारण से शांकरभाष्य में यह पाठ स्वीकार नहीं किया गया है, और यही युक्तिसंगत है। छान्दोग्य उपनिषद के कुछ मन्त्रों में 'प्रपद्ये' पद का बिना 'इति' के इसी प्रकार उपयोग किया गया है (छां॰ 8.14.1)। 'प्रपद्ये' क्रियापद प्रथमपुरुषान्त हो, तो कहना न होगा कि वक्ता से अर्थात् उपदेशकर्त्ता श्रीकृष्ण से उसका सम्बन्ध नहीं जोड़ा जा सकता। अब यह बतलाते है, कि इस प्रकार बर्तने से क्या फल मिलता है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १५, श्लोक १५.४