मूल श्लोक
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखाः गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
adhaścordhvaṃ prasṛtāstasya śākhāḥ guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ adhaśca mūlānyanusantatāni karmānubandhīni manuṣyaloke
अनुवाद
नीचे और ऊपर भी उसकी शाखाएँ फैली हुई है कि जो (सत्त्व आदि तीनों) गुणों से पली हुई हैं और जिनसे (शब्द-स्पर्श-रूप-रस और गन्ध-रूपी) विषयों के अंकुर फूटे हैं, एवं अन्त में कर्म का रूप पाने वाली उसकी जड़ नीचे मनुष्यलोक में भी बढ़ती गहरी चली गई है।
टिप्पणी
गीतारहस्य के आठवें प्रकरण (पृ. 179) में विस्तारसहित निरूपण कर दिया है, कि सांख्यशास्त्र के अनुसार प्रकृति और पुरुष ये ही दो मूल तत्त्व हैं; और जब पुरुष के आगे त्रिगुणात्मक प्रकृति अपना ताना-बाना फैलाने लगती है, तब महत् आदि तेईस तत्त्व उत्पन्न होते हैं, और उनसे यह ब्रह्माण्ड वृक्ष बन जाता है। परन्तु वेदान्तशास्त्र की दृष्टि से प्रकृति स्वतन्त्र नहीं है, वह परमेश्वर का ही एक अंश है, अतः त्रिगुणात्मक प्रकृति के इस फैलाव को स्वतन्त्र वृक्ष न मान कर यह सिद्धान्त किया है, कि ये शाखाएँ 'ऊर्ध्वमूल' पीपल की ही हैं। अब सिद्धान्त के अनुसार कुछ निराले स्वरूप का वर्णन इस प्रकार किया है कि पहले श्लोक में वर्णित वैदिक 'अधःशाख' वृक्ष की त्रिगुणों से पली हुई शाखाएँ न केवल 'नीचे' ही प्रत्युत 'ऊपर' भी फैली हुई हैं; और इसमें कर्म-विपाक-प्रक्रिया का धागा भी अन्त में पिरो दिया है। अनुगीता वाले ब्रह्मवृक्ष के वर्णन में केवल सांख्यशास्त्र के चौबीस तत्त्वों का ही ब्रह्मवृक्ष बतलाया गया है; उसमें इस वृक्ष के वैदिक और सांख्य वर्णनों का मेल नहीं मिलाया गया है (देखो मभा॰ अश्व॰ 35.22. 23 और गीतार॰ पृ. 179)। परन्तु गीता में ऐसा नहीं किया; दृश्य सृष्टिरूप वृक्ष के नाते से वेदों में पाए जाने वाले परमेश्वर का वर्णन का, और सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृति के विस्तार या ब्रह्माण्डवृक्ष के वर्णन का, इन दो श्लोकों में मेल कर दिया है। मोक्ष-प्राप्ति के लिए त्रिगुणात्मक और ऊर्ध्वमूल वृक्ष के इस फैलाव से मुक्त हो जाना चाहिए। परन्तु यह वृक्ष इतना बड़ा है, कि इसके ओर-छोर का पता ही नहीं चलता। अतएव अब बतलाते है कि इस अपार वृक्ष का नाश करके, इसके मूल में वर्तमान अमृत-तत्त्व को पहचानने को कौन-सा मार्ग है –
— Lokmanya Tilak