मूल श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śrībhagavānuvāca ūrdhvamūlamadhaḥśākhamaśvatthaṃ prāhuravyayam chandāṃsi yasya parṇāni yastaṃ veda sa vedavit
अनुवाद
श्रीभगवान ने कहा: जिस अश्वत्थ वृक्ष का ऐसा वर्णन करते है, कि जड़ (एक) ऊपर है, और शाखाएँ (अनेक) नीचे है, (जो) अव्यय अर्थात् कभी नाश नहीं पाता, (एवं) छन्दांसि अर्थात् वेद जिसके पत्ते है, उसे (वृक्ष को) जिसने जान लिया, वह पुरुष (सच्चा) वेदवेत्ता है।
टिप्पणी
उक्त वर्णन ब्रह्मवृक्ष का अर्थात् संसार-वृक्ष का है। यहाँ पर संसार का यह संकुचित अर्थ विवक्षित नहीं है, कि 'स्त्री-बाल-बच्चों में रहकर नित्य व्यवहार करते रहे,' परन्तु उसका यहाँ 'आँखों के सामने दिखाई देने वाला जगत अथवा दृश्य-सृष्टि ' अर्थ है। इस संसार को ही सांख्यमतवादी 'प्रकृति का विस्तार' और वेदान्ती 'भगवान की माया का पसार' कहते है; एवं अनुगीता में इसे ही 'ब्रह्मवृक्ष या ब्रह्मवन' (ब्रह्मारण्य) कहा है (मभा॰ अश्व॰ 35.47)। यह कल्पना अथवा रूपक न केवल वैदिक धर्म में ही है, कि प्रत्युत अन्य प्राचीन धर्मों में भी पाया जाता है, एक बिल्कुल छोटे से बीज से जिस प्रकार बड़ा भारी गगनचुंबी वृक्ष निर्माण हो जाता है, उसी प्रकार एक अव्यक्त परमेश्वर से दृश्य-सृष्टि -रूपी भव्य वृक्ष उत्पन्न हुआ है। यूरोप की पुरानी भाषाओं में इसके नाम 'विश्ववृक्ष' या 'जगतवृक्ष' हैं। ऋग्वेद में (1.24.7) वर्णन है, कि वरुणलोक में एक ऐसा वृक्ष है, कि जिसकी किरणों की जड़ ऊपर (ऊर्ध्व) है और उसकी किरणें ऊपर से नीचे (निचीनाः) फैलाती है। विष्णुसहस्रनाम में 'वारुणो वृक्षः' (वरूण के वृक्ष) को परमेश्वर के हजार नामों से एक ही नाम कहा है। यम और पितर जिस 'सुपलाश वृक्ष' के नीचे बैठकर सहपान करते है (ऋ॰ 10.135.1), अथवा जिसके 'अग्रभाग में स्वादिष्ट पीपल है, और जिस पर दो सुपर्ण अर्थात् पक्षी रहते है' (ऋ॰ 1.164.22), या 'जिस पिप्पल को (पीपल) वायुदेवता (मरुद्गण) हिलाते है' (ऋ॰5.54.12), वह वृक्ष भी यही है, अथर्वेद में जो वर्णन है, कि 'देवसदन अश्वत्थ तीसरे स्वर्गलोक में (वरुणलोक में) है' (अथर्व॰ 5.4.3; 19.39.6), वह भी इस वृक्ष के सम्बन्ध में जान पड़ता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में (3.8.12.2) अश्वत्थ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है – पितृयाण-काल में अग्नि अथवा यज्ञप्रजापति देवलोक से नष्ट होकर इस वृक्ष का अश्वत्थ (घोड़े) रूप धरकर एक वर्ष तक छिपा रहा था, इसी से इस वृक्ष का अश्वत्थ नाम हो गया (मभा॰अनु॰85); और एक नैरुक्ति कों का यह भी मत है, कि पितृयाण की लम्बी रात्रि में सूर्य के घोड़े यमलोक में इस वृक्ष के नीचे विश्राम किया करते है, इस-लिए इसको अश्वत्थ (अर्थात् घोड़े का स्थान) नाम प्राप्त हुआ होगा। 'अ' = नहीं, 'श्व' = कल और 'स्थ' = स्थिर – यह आध्यात्मिक निरुक्ति पीछे की कल्पना है। नाम-रूपात्मक माया का स्वरूप जब कि विनाशवान् अथवा हर घड़ी में पलटने वाला है तब उसको 'कल तक न रहनेवाला' तो कह सकेंगे; परन्तु 'अव्यय' - अर्थात् 'जिसका कभी भी व्यय नहीं होता' – विशेषण स्पष्ट कर देता है, कि यह अर्थ यहाँ अभिमत नहीं है। पहले पीपल के वृक्ष को ही अश्वत्थ कहते थे, कठोपनिषद् (6.1) में जो यह ब्रह्ममय अमृत अश्वत्थवृक्ष कहा गया है – उर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते॥ वह भी यही है; 'ऊर्ध्वमूलमधःशाखं' इस पद-सादृश्य से ही व्यक्त होता है, कि भगवद्गीता का वर्णन कठोपनिषद् के वर्णन से ही लिया गया है। परमेश्वर स्वर्ग में है और उससे उपजा हुआ जगद्-वृक्ष नीचे अर्थात् मनुष्यलोक में है, अतः वर्णन किया गया है, कि इस वृक्ष का मूल अर्थात् परमेश्वर ऊपर है और इसकी अनेक शाखाएँ अर्थात् जगत् का फैलाव नीचे विस्तृत है। परन्तु प्राचीन धर्मग्रन्थों में एक और कल्पना पाई जाती है, कि यह संसार-वृक्ष वटवृक्ष होगा, न कि पीपल; क्योंकि बड़ के पेड़ के पाये ऊपर से नीचे को उलट आते है। उदाहरण के लिए यह वर्णन है, कि अश्वत्थवृक्ष आदित्य का वृक्ष है और 'न्यग्रोधो वारुणो वृक्ष' – न्यग्रोध अर्थात् नीचे (न्यक्) बढ़ने वाला (गेध) बड़ का पेड़ वरुण का वृक्ष है (गोभिलगृह्य. 4.7.24)। महाभारत में लिखा है कि मार्कडेय ऋषि ने प्रलयकाल में बालरूपी परमेश्वर को एक (उस प्रलयकाल में भी नष्ट न होनेवाले, अतएव) अव्यय न्यग्रोध अर्थात् बड़ के पेड़ की टहनी पर देखा था (मभा॰ वन॰ 188.91)। इसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषद् में यह दिखलाने के लिए, कि अव्यक्त परमेश्वर से अपार दृश्य जगत कैसे निर्मित होता है, जो दृष्टान्त दिया है वह भी न्यग्रोध के ही बीज का है (छां॰ 6.12.1)। श्वेताश्वतर उपनिषद में भी विश्ववृक्ष का वर्णन है (श्वे॰ 6.6); परन्तु वहाँ खुलासा नहीं बतलाया है कि वह कौन-सा वृक्ष है। मुण्डक उपनिषद (3.1) में ऋग्वेद का ही यह वर्णन ले लिया है, कि इसी वृक्ष पर दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) बैठे हुए हैं, जिनके एक पिप्पल अर्थात् पीपल के फलों को खाता है। पीपल और बड़ को छोड़ इस संसारवृक्ष के स्वरूप की तीसरी कल्पना औदुम्बर की है; एवं पुराणों में यह दत्तात्रेय का वृक्ष माना गया है। सारांश, प्राचीन ग्रन्थों में ये तीन कल्पनाएँ है, कि परमेश्वर की माया से उत्पन्न हुआ जगत एक बड़ा पीपल, बड़ या गूलर है, और इसी कारण से विष्णुसहस्रनाम में विष्णु के ये तीन वृक्षात्मक नाम दिए है - 'न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थः' (मभा॰ अनु॰ 143.101), एवं समाज में भी ये तीनों वृक्ष देवात्मक और पूजने-योग्य माने जाते हैं! इसके अतिरिक्त विष्णुसहस्रनाम और गीता, दोनों ही महाभारत के भाग है, जब विष्णुसहस्रनाम में गूलर, बरगद (न्यगोध) और अश्वत्थ, ये तीन नाम पृथक नाम दिए गए हैं, तब गीता में 'अश्वत्थ' शब्द का पीपल ही (गूलर या बरगद नहीं) अर्थ लेना चाहिए, और मूल का अर्थ भी वही है। 'छन्दांसि अर्थात् वेद जिसके पत्ते है' इस वाक्य के 'छन्दांसि' शब्द में छद् = ढँकना धातु मान कर (देखो छां॰ 1.4.2) वृक्ष को ढँकने वाले पत्तों से वेदों की समता वर्णित है; और अन्त में कहा है, कि जब यह सम्पूर्ण वर्णन वैदिक परम्परा के अनुसार है, तब इसे जिसने जान लिया उसे वेदवेत्ता कहना चाहिए। इस प्रकार वैदिक वर्णन हो चुका; अब इसी वृक्ष का दूसरे प्रकार से, अर्थात् सांख्यशास्त्र के अनुसार वर्णन करते है–
— Lokmanya Tilak