भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १५.१८ ·

English

मूल श्लोक

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yasmātkṣaramatīto'hamakṣarādapi cottamaḥ ato'smi loke vede ca prathitaḥ puruṣottamaḥ

१५.१८अध्याय १५ · पुरुषोत्तमयोग२० में से श्लोक १८

अनुवाद

जब कि मैं क्षर से भी परे का और अक्षर से भी उत्तम (पुरुष) हूँ, लोक-व्यवहार में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से मैं प्रसिद्ध हूँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सोलहवें श्लोक में 'क्षर' और 'अक्षर' शब्द सांख्यशास्त्र के व्यक्त और अव्यक्त – अथवा व्यक्त सृष्टि और अव्यक्त प्रकृति – इन दो शब्दों से समानार्थक हैं। प्रगट है कि इनमें क्षर ही नाशवान पंचभूतात्मक व्यक्त पदार्थ है। स्मरण रहे कि 'अक्षर' विशेषण पहले कई बार जब परब्रह्म को भी लगाया गया है (देखो गी॰ 8.3; 8.21; 11.37; 12.3), तब पुरुषोत्तम के उल्लिखित लक्षण में 'अक्षर' शब्द का अर्थ अक्षर-ब्रह्म नहीं है, किन्तु उसका अर्थ सांख्यों की अक्षर प्रकृति है; और इस गड़बड़ से बचाने के लिए सोलहवें श्लोक में 'अक्षर अर्थात् कूटस्थ (प्रकृति)' यह विशेष व्याख्या की है (गीतारहस्य पृ. 201 – 204)। सारांश, व्यक्त सृष्टि और अव्यक्त प्रकृति के परे का अक्षरब्रह्म (गी॰ 8.20 – 22 पर हमारी टिप्पणी देखो) और 'क्षर' (व्यक्त सृष्टि ) एवं 'अक्षर' (प्रकृति) से परे का पुरुषोत्तम, वास्तव में ये दोनों एक ही हैं। तेरहवें अध्याय (13.31) में कहा गया है, कि इस ही परमात्मा कहते हैं और यही परमात्मा शरीर में क्षेत्रज्ञ रूप से रहता है। इससे सिद्ध होता क्षर-अक्षर-विचार का भी पर्यवसान है, अथवा 'पिंड में और ब्रह्माण्ड में' एक ही पुरुषोत्तम है। इसी प्रकार यह भी बतलाया गया है, कि अधिभूत और अधियज्ञ प्रभृति का अथवा प्राचीन अश्वत्थ वृक्ष का तत्त्व भी यही है। इस ज्ञान-विज्ञान प्रकरण का अन्तिम निष्कर्ष यह है, कि जिसने जगत की इस एकता को जान लिया कि 'सब भूतों में एक आत्मा है' (गी॰ 6.29) और जिसके मन में यह पहचान जिन्दगी भर के लिए स्थिर हो गई (वे॰ सू॰ 4.1.12; गी॰ 8.6), यह कर्मयोग का आचरण करते-करते ही परमेश्वर की प्राप्ति कर लेता है। कर्म न करने पर केवल परमेश्वर-भक्ति से भी मोक्ष मिल जाता है; परन्तु गीता के ज्ञान-विज्ञान-निरूपण का यह तात्पर्य नहीं है। सातवें अध्याय के आरम्भ में ही कह दिया है, कि ज्ञान-विज्ञान के निरूपण का आरम्भ यही दिखलाने के लिए किया गया है, कि ज्ञान से अथवा भक्ति से शुद्ध हुई निष्काम बुद्धि के द्वारा संसार के सभी कर्म करने चाहिए और इन्हें करते हुए भी मोक्ष मिलता है। अब बतलाते है, कि इसे जान लेने से क्या फल मिलता है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १५, श्लोक १५.१८