मूल श्लोक
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
dvāvimau puruṣau loke kṣaraścākṣara eva ca kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho'kṣara ucyate
अनुवाद
(इस) लोक में 'क्षर' और 'अक्षर' दो पुरुष हैं। सब (नाशवान) भूतों को क्षर कहते है और कूटस्थ को, अर्थात् इन सब भूतों के मूल (कूट) में रहनेवाले (प्रतिरूप अव्यक्त तत्त्व) को अक्षर कहते है।