भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १४.९ ·

English

मूल श्लोक

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

sattvaṃ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata jñānamāvṛtya tu tamaḥ pramāde sañjayatyuta

१४.९अध्याय १४ · गुणत्रयविभागयोग२७ में से श्लोक ९

अनुवाद

सत्त्वगुण सुख में, और रजोगुण कर्म में आसक्ति उत्पन्न करता है। परन्तु हे भारत! तमोगुण ज्ञान को ढँक कर प्रमाद अर्थात् कर्तव्य-मूढता में या कर्तव्य के विस्मरण में आसक्ति उत्पन्न करता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों के ये पृथक लक्षण बतलाए गए हैं। किन्तु ये गुण पृथक-पृथक कभी भी नहीं रहते, तीनों सदैव एकत्र रहा करते हैं। उदाहरणार्थ, कोई भला काम करना यद्यपि सत्त्व का लक्षण है, तथापि भले काम को करने की प्रवृति होना रज का धर्म है, इस कारण सात्त्विक स्वभाव में भी थोड़े से रज का मिश्रण सदैव रहता ही है। इसी से अनुगीता में इन गुणों का इस प्रकार मिथुनात्मक वर्णन है कि तम को जोड़ा सत्त्व है, और सत्त्व का जोड़ा रज है (मभा॰ अश्व॰ 36); और कहा है, कि इनके अन्योन्य अर्थात् पारस्परिक आश्रय से अथवा झगड़े से सृष्टि के सब पदार्थ बनते हैं। (देखो सा. का॰ 12 और गीतार॰ पृ. 157 और 158)। अब पहले इसी तत्त्व को बतला कर फिर सात्त्विक, राजस और तामस स्वभाव के लक्षण बतलाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १४, श्लोक १४.९