मूल श्लोक
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
rajo rāgātmakaṃ viddhi tṛṣṇāsaṅgasamudbhavam tannibadhnāti kaunteya karmasaṅgena dehinam
अनुवाद
रजोगुण का स्वभाव रागात्मक है, इससे तृष्णा और आसक्ति की उत्पत्ति होती है। हे कौन्तेय! वह प्राणी को कर्म करने के (प्रकृतिरूप) संग से बाँध डालता है।