मूल श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śrībhagavānuvāca prakāśaṃ ca pravṛttiṃ ca mohameva ca pāṇḍava na dveṣṭi saṃpravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati
अनुवाद
श्रीभगवान ने कहा: हे पांडव! प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह (अर्थात् क्रम से सत्त्व, रज और तम इन गुणों के कार्य अथवा फल) होने से जो उनका द्वेष नहीं करता, और प्राप्त न हों तो उनकी आकांक्षा नहीं रखता,