मूल श्लोक
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
guṇānetānatītya trīndehī dehasamudbhavān janmamṛtyujarāduḥkhairvimukto'mṛtamaśnute
अनुवाद
देहधारी मनुष्य देह की उत्पत्ति के कारण (स्वरूप) उन तीनों को अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे के दुःखों से विमुक्त होता हुआ अमृत का अर्थात् मोक्ष का अनुभव करता है।
टिप्पणी
वेदान्त में जिसे माया कहते है, उसी को सांख्यमत-वाले त्रिगुणात्मक प्रकृति कहते हैं; इस लिए त्रिगुणातीत होना ही माथा से छूट कर परब्रह्म को पहचान लेना है (गी॰ 2.45); और इसी को ब्राह्मी अवस्था कहते है (गी॰ 2.72; 18.53)। अध्यात्मशास्त्र में बतलाए हुए त्रिगुणातीत के इस लक्षण को सुन कर उसका और अधिक वृत्तान्त जानने की अर्जुन को इच्छा हुई और द्वितीय अध्याय (2.54) में जैसा उसने स्थितप्रज्ञ के सम्बन्ध में प्रश्न किया था, वैसा ही यहाँ भी पूछता है –
— Lokmanya Tilak