मूल श्लोक
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति ।गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭā'nupaśyati guṇebhyaśca paraṃ vetti madbhāvaṃ so'dhigacchati
अनुवाद
द्रष्टा अर्थात् उदासीनता से देखने वाले पुरुष, जब जान लेता है कि (प्रकृति) गुणों के अतिरिक्त दूसरा कोई कर्ता नहीं है, और जब (तीनों) गुणों से परे (तत्त्व को) पहचान जाता है, तब वह मेरे स्वरूप में मिल जाता है।