मूल श्लोक
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ūrdhvaṃ gacchanti sattvasthā madhye tiṣṭhanti rājasāḥ jaghanyaguṇavṛttisthā adho gacchanti tāmasāḥ
अनुवाद
सात्त्विक पुरुष ऊपर के, अर्थात् स्वर्ग आदि, लोकों को जाते है। राजस मध्यम लोक में अर्थात् मनुष्य लोक में रहते है और कनिष्ठगुण वृत्ति में तामस अधोगति पाते है।
टिप्पणी
सांख्यकारिका में भी यह वर्णन है, कि धार्मिक और पुण्यकर्म-कर्ता होने के कारण सत्त्वस्थ मनुष्य स्वर्ग पाता है और अधर्माचरण करके तामस पुरुष अधोगति पाता है (सां॰ का॰ 44)। इसी प्रकार यह 18 वाँ श्लोक अनुगीता के त्रिगुण-वर्णन में भी ज्यों का त्यों आया है (देखो मभा॰ अश्व॰ 39.10; और मनु॰ 12.40)। सात्त्विक कर्मों से स्वर्ग-प्राप्ति हो भले जावे, पर स्वर्गसुख है तो अनित्य ही; इस कारण परम पुरुषार्थ की सिद्धि इससे नहीं होती है। सांख्यों का सिद्धान्त है, कि इस परम पुरुषार्थ या मोक्ष की प्राप्ति के लिए उत्तम सात्त्विक स्थिति तो रहे ही; इसके सिवा यह ज्ञान होना भी आवश्यक है, कि प्रकृति अलग है और मैं (पुरुष) जुदा हूँ। सांख्य इसी को त्रिगुणातीत-अवस्था कहते है। यद्यपि यह स्थिति सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों से भी परे की है तो भी यह सात्त्विक अवस्था की ही पराकाष्ठा है; इस कारण इसका समावेश सामान्यतः सात्त्विक वर्ग में ही किया जाता है, इसके लिए एक नया चौथा वर्ग बनाने की आवश्यकता नहीं है (देखो गीतार॰ पृ. 167 – 168)। परन्तु गीता को यह प्रकृति-पुरुष-वाला सांख्यों का द्वैत मान्य नहीं है; इसलिए सांख्यों के उक्त सिद्धान्त का गीता में इस प्रकार रूपान्तर हो जाता है, कि प्रकृति और पुरुष से परे जो एक आत्मस्वरूप परमेश्वर या परब्रह्म है, उस निर्गुण ब्रह्म को जो पहचान लेता है उसे त्रिगुणातीत कहना चाहिए। यही अर्थ अगले श्लोकों में वर्णित है –
— Lokmanya Tilak