मूल श्लोक
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yathā sarvagataṃ saukṣmyādākāśaṃ nopalipyate sarvatrāvasthito dehe tathā''tmā nopalipyate
अनुवाद
जैसे आकाश चारों ओर भरा हुआ परन्तु सूक्ष्म होने के कारण उसे (किसी का भी लेप) नहीं लगता, वैसे ही देह में सर्वज्ञ रहने पर भी आत्मा को (किसी का भी) लेप नहीं लगता।