मूल श्लोक
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्माऽयमव्ययः ।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
anāditvānnirguṇatvātparamātmā'yamavyayaḥ śarīrastho'pi kaunteya na karoti na lipyate
अनुवाद
हे कौन्तेय! अनादि और निर्गुण होने के कारण यह अव्यक्त परमात्मा शरीर में रह कर भी कुछ करता-धरता नहीं है, और उसे (किसी भी कर्म का) लेप अर्थात् बन्धन नहीं लगता।