मूल श्लोक
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
kṣetrajñaṃ cāpi māṃ viddhi sarvakṣetreṣu bhārata kṣetrakṣetrajñayorjñānaṃ yattajjñānaṃ mataṃ mama
अनुवाद
हे भारत! सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही समझ। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है वही मेरा (परमेश्वर का) ज्ञान माना गया है।
टिप्पणी
पहले श्लोक में 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' इन दो शब्दों का अर्थ दिया है; और दूसरे श्लोक में क्षेत्रज्ञ का स्वरूप बतलाया है, कि क्षेत्रज्ञ मैं परमेश्वर हूँ, अथवा जो पिंड में है वही ब्रह्माण्ड में है। दूसरे श्लोक के चापि= भी शब्दों का अर्थ यह है – न केवल क्षेत्रज्ञ ही प्रत्युत क्षेत्र भी मैं ही हूँ। क्योंकि जिन पंचमहाभूतों से बने हुए रहने के कारण क्षेत्र का समावेश उस वर्ग में होता है जिसे क्षर-अक्षर-विचार में 'क्षर' कहते है; और क्षेत्रज्ञ ही परमेश्वर है। इस प्रकार क्षर-अक्षर-विचार के समान ही क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विचार भी परमेश्वर के ज्ञान का एक भाग बन जाता है (देखो गीतार॰ पृ. 142 – 148)। और इसी अभिप्राय को मन में लाकर दूसरे श्लोक के अन्त में यह वाक्य आया है कि 'क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है वही मेरा अर्थात् परमेश्वर का ज्ञान है।' जो अद्वैत वेदान्त को नहीं मानते, उन्हें 'क्षेत्रज्ञ भी मैं हूँ' इस वाक्य की खींचातानी करनी पड़ती है, और प्रतिपादन करना पड़ता है, कि इस वाक्य से 'क्षेत्रज्ञ' तथा 'मैं, परमेश्वर' का अभेदभाव नहीं दिखलाया जाता। और कई लोग 'मेरा' (मम) इस पद का अन्वय 'ज्ञान' शब्द के साथ न लगा 'मतं' अर्थात् 'माना गया है' शब्द के साथ लगा कर यों अर्थ करते है कि 'इनके ज्ञान को मैं ज्ञान समझता हूँ।' पर ये अर्थ सहज नहीं है। आठवें अध्याय के आरम्भ में ही वर्णन है, कि देह में निवास करनेवाला आत्मा (अधिदेव) मैं ही हूँ, अथवा 'जो पिंड में है, वही ब्रह्माण्ड में है;' और सातवें में भी भगवान ने 'जीव' को अपनी ही परा प्रकृति कहा है (7.5)। इसी अध्याय के 22 वें और 31 वें श्लोक में भी ऐसा ही वर्णन है। अब बतलाते है कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विचार कहाँ पर और किसने किया है –
— Lokmanya Tilak