मूल श्लोक
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
anye tvevamajānantaḥ śrutvā'nyebhya upāsate te'pi cātitarantyeva mṛtyuṃ śrutiparāyaṇāḥ
अनुवाद
परन्तु इस प्रकार जिन्हें (अपने आप ही) ज्ञान नहीं होता वे दूसरे से सुन कर (श्रद्धा से) परमेश्वर का भजन करते हैं। सुनी हुई बात को प्रमाण मान कर बर्तने वाले ये पुरुष भी मृत्यु को पार कर जाते हैं।
टिप्पणी
इन दो श्लोकों में पातंजलयोग के अनुसार ध्यान, सांख्यमार्ग के अनुसार ज्ञानोत्तर कर्मसंन्यास, कर्मयोग-मार्ग के अनुसार निष्काम बुद्धि से परमेश्वरार्पणपूर्वक कर्म करना, और ज्ञान न हो तो भी श्रद्धा से आप्तों के वचनों पर विश्वास रख कर परमेश्वर की भक्ति करना (गी॰4.39), ये आत्मज्ञान के भिन्न-भिन्न मार्ग बतलाए गए हैं। कोई किसी भी मार्ग से जावे, अन्त में उसे भगवान का ज्ञान होकर मोक्ष मिल ही जाता है। तथापि पहले जो यह सिद्धान्त किया गया है, कि लोकसंग्रह की दृष्टि से कर्मयोग श्रेष्ठ है, वह इससे खंडित नहीं होता। इस प्रकार साधन बतला कर सामान्य रीति से समग्र विषय का अगले श्लोक में उपसंहार किया है, और उसमें भी वेदान्त के कापिल सांख्य का मेल मिला दिया है।
— Lokmanya Tilak