मूल श्लोक
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
puruṣaḥ prakṛtistho hi bhuṅkte prakṛtijānguṇān kāraṇaṃ guṇasaṅgo'sya sadasadyonijanmasu
अनुवाद
क्योंकि पुरुष प्रकृति में अधिष्ठित होकर प्रकृति के गुणों का उपभोग करता है; और (प्रकृति के) गुणों को यह संयोग पुरुष को भली-बुरी योनियों में जन्म लेने के लिए कारण होता है।
टिप्पणी
प्रकृति और पुरुष के पारस्परिक सम्बन्ध का और भेद का यह वर्णन सांख्यशास्त्र का है (देखो गीतार॰ पृ. 154 – 162)। अब यह कह कर, कि वेदान्ती लोग पुरुष को परमात्मा कहते है, सांख्य और वेदान्त का मेल कर दिया गया है, और ऐसा करने से प्रकृति-पुरुष-विचार एवं क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार की पूरी एकवाक्यता हो जाती है।
— Lokmanya Tilak