मूल श्लोक
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
kāryakāraṇakartṛtve hetuḥ prakṛtirucyate puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve heturucyate
अनुवाद
कार्य अर्थात् देह के और कारण अर्थात् इन्द्रियों के कर्तृत्व के लिए प्रकृति कारण कही जाती है; और (कर्ता न होने पर भी) सुख-दुःखों को भोगने के लिए पुरुष (क्षेत्रज्ञ) कारण कहा जाता है।
टिप्पणी
इस श्लोक में 'कार्यकरण' के स्थान में 'कार्यकारण' भी पाठ है, और तब उसका अर्थ होता है – सांख्यों के महत् आदि तेईस तत्त्व एक से दूसरा, दूसरे से तीसरा इस कार्य-कारण क्रम से उपज कर सारी व्यक्त सृष्टि प्रकृति से बनती है। यह अर्थ भी वेजा नहीं है; परन्तु क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विचार में क्षेत्र की उत्पत्ति बतलाना प्रसंगानुसार नहीं है। प्रकृति से जगत् के उत्पन्न होने का वर्णन तो पहले ही सातवें और नवें अध्याय में हो चुका है। अतएव 'कार्यकरण' पाठ है।
— Lokmanya Tilak