मूल श्लोक
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhyanādī ubhāvapi vikārāṃśca guṇāṃścaiva viddhi prakṛtisaṃbhavān
अनुवाद
प्रकृति और पुरुष, दोनों को ही अनादि समझ। विकार और गुणों को प्रकृति से ही उपजा हुआ ज्ञान जान।
टिप्पणी
सांख्यशास्त्र के मत में प्रकृति और पुरुष, दोनों न केवल अनादि है प्रत्युत स्वतन्त्र और स्वयंभू भी हैं! वेदान्ती समझते हैं कि प्रकृति परमेश्वर से ही उत्पन्न हुई है, अतएव वह न स्वयंभू है और न स्वतन्त्र है (गी॰ 4.5,6)। परन्तु यह नहीं बतलाया जा सकता, कि परमेश्वर से प्रकृति कब उत्पन्न हुई; और पुरुष (जीव) परमेश्वर का अंश है (गी॰ 15.6); इस कारण वेदान्तियों को इतना मान्य है, कि दोनों अनादि हैं। इस विषय का अधिक विवेचन गीतारहस्य के 7 वें प्रकरण में और विशेषतः पृ. 161 – 167 में, एवं 10 वें प्रकरण के पृ. 262 – 265 में किया है।
— Lokmanya Tilak