भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १३.२० ·

English

मूल श्लोक

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhyanādī ubhāvapi vikārāṃśca guṇāṃścaiva viddhi prakṛtisaṃbhavān

१३.२०अध्याय १३ · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३५ में से श्लोक २०

अनुवाद

प्रकृति और पुरुष, दोनों को ही अनादि समझ। विकार और गुणों को प्रकृति से ही उपजा हुआ ज्ञान जान।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सांख्यशास्त्र के मत में प्रकृति और पुरुष, दोनों न केवल अनादि है प्रत्युत स्वतन्त्र और स्वयंभू भी हैं! वेदान्ती समझते हैं कि प्रकृति परमेश्वर से ही उत्पन्न हुई है, अतएव वह न स्वयंभू है और न स्वतन्त्र है (गी॰ 4.5,6)। परन्तु यह नहीं बतलाया जा सकता, कि परमेश्वर से प्रकृति कब उत्पन्न हुई; और पुरुष (जीव) परमेश्वर का अंश है (गी॰ 15.6); इस कारण वेदान्तियों को इतना मान्य है, कि दोनों अनादि हैं। इस विषय का अधिक विवेचन गीतारहस्य के 7 वें प्रकरण में और विशेषतः पृ. 161 – 167 में, एवं 10 वें प्रकरण के पृ. 262 – 265 में किया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १३, श्लोक १३.२०