भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १३.१९ ·

English

मूल श्लोक

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

iti kṣetraṃ tathā jñānaṃ jñeyaṃ coktaṃ samāsataḥ madbhakta etadvijñāya madbhāvāyopapadyate

१३.१९अध्याय १३ · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३५ में से श्लोक १९

अनुवाद

इस प्रकार संक्षेप में बतला दिया कि क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय किसे कहते है। मेरा भक्त इसे जान कर, मेरे स्वरूप को पाता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

अध्यात्म या वेदान्तशास्त्र के आधार से अब तक क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का विचार किया गया। इनमें 'ज्ञेय' ही क्षेत्रज्ञ अथवा परब्रह्म है और 'ज्ञान' दूसरे श्लोक में बतलाया हुआ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-ज्ञान है, इस कारण यही संक्षेप में परमेश्वर के सब ज्ञान का निरूपण है। 18 वें श्लोक में यह सिद्धान्त बतला दिया है, कि जब क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार ही परमेश्वर का ज्ञान है, तब आगे यह आप ही सिद्ध है, कि उसका फल भी मोक्ष ही होना चाहिए। वेदान्तशास्त्र का क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार यहाँ समाप्त हो गया। परन्तु प्रकृति से ही पांचभौतिक विकारवान् क्षेत्र उत्पन्न होता है इसलिए, और सांख्य जिसे 'पुरुष' कहते हैं, उसे ही अध्यात्मशास्त्र में 'आत्मा' कहते है इसलिए, सांख्य की दृष्टि से क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचार ही प्रकृति-पुरुष का विवेक होता है। गीताशास्त्र प्रकृति और पुरुष को सांख्य के समान दो स्वतन्त्र तत्त्व नहीं मानता; सातवें अध्याय (7.4,5) में कहा है, कि ये एक ही परमेश्वर के, कनिष्ठ और श्रेष्ठ, दो रूप है। परन्तु सांख्यों के द्वैत के बदले गीताशास्त्र के इस अद्वैत को एक बार स्वीकार कर लेने पर, फिर प्रकृति और पुरुष के परस्पर सम्बन्ध का सांख्यों का ज्ञान गीता को अमान्य नहीं है। और यह भी कह सकते है, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के ज्ञान का ही रूपान्तर प्रकृति-पुरुष का विवेक है (देखो गीतार॰ प्र. 7)। इसीलिए अब तक उपनिषदों के आचार से जो क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान बतलाया गया, उसे ही अब सांख्यों की परिभाषा में किन्तु सांख्यों के द्वैत को अस्वीकार करके प्रकृति-पुरुष-विवेक के रूप से बतलाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १३, श्लोक १३.१९