भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १३.१८ ·

English

मूल श्लोक

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य धिष्ठितम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

jyotiṣāmapi tajjyotistamasaḥ paramucyate jñānaṃ jñeyaṃ jñānagamyaṃ hṛdi sarvasya dhiṣṭhitam

१३.१८अध्याय १३ · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३५ में से श्लोक १८

अनुवाद

उसे ही तेज का भी तेज, और अन्धकार से परे का कहते है; ज्ञान, जो जानने योग्य है वह (ज्ञेय), और ज्ञानगम्य अर्थात् ज्ञान से (ही) विदित होनेवाला भी (वही) है; सब के हृदय में वही अधिष्ठित है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

अचिन्त्य और अक्षर परब्रह्म – जिसे कि क्षेत्रज्ञ अथवा परमात्मा भी कहते है – (गी॰ 13.22) का जो वर्णन ऊपर है, वह आठवें अध्याय वाले अक्षर ब्रह्म के वर्णन के समान (गी॰ 8.19 – 1) उपनिषदों के आधार पर किया गया है। पूरा तेरहवाँ श्लोक (श्वे॰ 3.16) और अगले श्लोक का यह अर्धांश कि 'सब इन्द्रियों के गुणों का भास होनेवाला, तथापि सब इन्द्रियों से विरहित' श्वेताश्वतर उपनिषद् (3.17) में ज्यों का त्यों है; एवं 'दूर होने पर भी समीप' ये शब्द ईशावास्य (5) और मुण्डक (3.1.7) उपनिषदों में पाए जाते है। ऐसे ही 'तेज का तेज' ये शब्द बृहदारण्यक (4.4.16) के हैं, और 'अन्धकार से परे का' ये शब्द श्वेताश्वतर (3.8) के हैं। इसी भाँति यह वर्णन कि 'जो न तो सत् कहा जाता है और न असत् कहा जाता है' ऋग्वेद के 'नासदासीत् नो सदासीत्' इस ब्रह्म-विषयक प्रसिद्ध सूक्त को (ऋ॰10.129) लक्ष्य कर किया गया है। 'सत्' और 'असत्' शब्दों के अर्थों का विचार गीतारहस्य पृ. 243 – 244 में विस्तार सहित किया गया है; और फिर गीता 9.18 वें के श्लोक की टिप्पणी में भी किया गया है। गीता 9.19 में कहा है कि 'सत्' और 'असत्' मैं ही हूँ। अब यह वर्णन विरुद्ध सा जँचता है, कि सच्चा ब्रह्म न 'सत्' है और न 'असत्'। परन्तु वास्तव में यह विरोध सच्चा नहीं है। क्योंकि 'व्यक्त' (क्षर) सृष्टि और 'अव्यक्त' (अक्षर) सृष्टि , ये दोनों यद्यपि परमेश्वर के ही स्वरूप हों, तथापि सच्चा परमेश्वरतत्त्व इन दोनों से परे अर्थात् पूर्णतया अज्ञेय है। यह सिद्धान्त गीता में ही पहले 'भूतभृन्न च भूतस्थः' (गी॰ 9.5) में और आगे फिर (15.16, 17) पुरुषोत्तम-लक्षण में स्पष्टतया बतलाया गया है। निर्गुण ब्रह्म किसे कहते हैं, और जगत् में रहकर भी वह जगत् से बाहर कैसे है अथवा वह 'विभक्त' अर्थात् नानारूपात्मक देख पड़ने पर भी मूल में अविभक्त अर्थात् एक ही कैसे है, इत्यादि प्रश्नों का विचार गीतारहस्य के नवें प्रकरण में (पृ. 208 से आगे) किया जा चुका है। सोलहवें श्लोक में 'विभक्तमिव' का अनुवाद यह है - 'मानो विभक्त हुआ सा देख पड़ता है।' यह 'इव' शब्द उपनिषदों में अनेक बार इसी अर्थ में आया है, कि जगत का नानात्व भ्रान्ति कारक है और एकत्व ही सत्य है। उदाहरणार्थ 'द्वैतमिव भवति,' 'य इह नानेव पश्यति' इत्यादि (बृ॰2.4.14; 4.4.19; 4.3.9)। अतएव प्रगट है, कि गीता में यह अद्वैत सिद्धान्त ही प्रतिपाद्य है, कि नाना नाम-रूपात्मक माया भ्रम है और उसमें अविभक्त से रहनेवाला ब्रह्म ही सत्य है। गीता 18.20 में फिर बतलाया है, कि 'अविभक्तं विभक्तेषु' अर्थात् नानात्व में एकत्व देखना सात्त्विक ज्ञान का लक्षण है। गीतारहस्य के अध्यात्म प्रकरण में वर्णन है, कि यही सात्त्विक ज्ञान ब्रह्म है। देखो गीतार॰ पृ. 214, 215 और पृ. 131 – 132।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १३, श्लोक १३.१८