मूल श्लोक
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktamiva ca sthitam bhūtabhartṛ ca tajjñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca
अनुवाद
वह (तत्त्वतः) 'अविभक्त' अर्थात् अखंडित होकर भी, सब भूतों में मानो (नानात्व से) विभक्त हो रहा है; और (सब) भूतों का पालन करनेवाला, ग्रसने वाला एवं उत्पन्न करनेवाला भी उसे ही समझना चाहिए।