भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १३.११ ·

English

मूल श्लोक

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

mayi cānanyayogena bhaktiravyabhicāriṇī viviktadeśasevitvamaratirjanasaṃsadi

१३.११अध्याय १३ · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३५ में से श्लोक ११

अनुवाद

और मुझ में अनन्य भाव से अटल भक्ति , 'विविक्त' अर्थात् चुने हुए अथवा एकान्त स्थान में रहना, साधारण लोगों के जमाव को पसन्द न करना,

— Lokmanya Tilak

अध्याय १३, श्लोक १३.११