मूल श्लोक
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
adhyātmajñānanityatvaṃ tattvajñānārthadarśanam etajjñānamiti proktamajñānaṃ yadato'nyathā
अनुवाद
अध्यात्म ज्ञान को नित्य समझना और तत्त्वज्ञान के सिद्धान्तों का परिशीलन – इनको ज्ञान कहते है; इसके व्यतिरिक्त जो कुछ है वह सब अज्ञान है।
टिप्पणी
सांख्यों के मत में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ही प्रकृति-पुरुष के विवेक का ज्ञान है; और उसे इसी अध्याय में आगे बतलाया है (13.19 – 23; 14.18)। इसी प्रकार अठारहवें अध्याय (18.20) में ज्ञान के स्वरूप का यह व्यापक लक्षण बतलाया है – 'अविभक्तं विभक्तेषु।' परन्तु मोक्षशास्त्र में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के ज्ञान का अर्थ बुद्धि से यही जान लेने नहीं होता, कि अमुक-अमुक बातें अमुक प्रकार ही हैं। अध्यात्मशास्त्र का सिद्धान्त यह है, कि उस ज्ञान का देह के स्वभाव पर साम्यबुद्धिरूप परिणाम होना चाहिए; अन्यथा वह ज्ञान अपूर्ण या कच्चा है। अतएव यह नहीं बतलाया, कि बुद्धि से अमुक-अमुक जान लेना ही ज्ञान है; बल्कि , ऊपर पाँच श्लोकों में ज्ञान की इस प्रकार व्याख्या की गई है, कि जब उक्त श्लोकों में बतलाए हुए बीस गुण (मान और दम्भ का छूट जाना, अहिंसा, अनासक्ति , समबुद्धि इत्यादि) मनुष्य के स्वभाव में देख पड़ने लगे तब, उसे ज्ञान कहना चाहिए; (गीतार॰ पृ.240 और 248)। दसवें श्लोक में 'विविक्तस्थान में रहना और जमाव को नापसन्द करना' भी ज्ञान का एक लक्षण कहा है; इससे कुछ लोगों ने यह दिखाने का प्रयत्न किया है, कि गीता को संन्यास मार्ग ही अभीष्ट है। किन्तु हम पहले ही बतला आए है (देखो गी॰ 12.19 की टिप्पणी और गीतार॰ पृ. 283) कि यह मत ठीक नहीं है, और ऐसा अर्थ करना उचित भी नहीं है। यहाँ इतना ही विचार किया है कि 'ज्ञान' क्या है; और वह ज्ञान बाल-बच्चों में, घर-गृहस्थी में अथवा लोगों के जमाव में अनासक्ति है, एवं इस विषय में कोई वाद भी नहीं है। अब अगला प्रश्न यह है कि इस ज्ञान के हो जाने पर, इसी अनासक्ति -बुद्धि से बाल-बच्चों में अथवा संसार में रह कर प्राणिमात्र के हितार्थ जगत के व्यवहार किए जाएँ अथवा न किए जाएँ; और केवल ज्ञान की व्याख्या से ही इसका निर्णय करना उचित नहीं है। क्योंकि गीता में ही भगवान ने अनेक स्थलों पर कहा है, कि ज्ञानी पुरुष कर्मों में लिप्त न होकर उन्हें असक्त-बुद्धि से लोकसंग्रह के निमित्त करता रहे और इसकी सिद्धि के लिए जनक के बर्ताव का और अपने व्यवहार का उदाहरण भी दिया है (गी॰ 3.19 – 25; 4.14)। समर्थ श्रीरामदास स्वामी के चरित्र से यह बात प्रगट होती है; कि शहर में रहने की लालसा न रहने पर भी जगत के व्यवहार केवल कर्तव्य समझकर कैसे किए जा सकते है (देखो दासबोध 19.6.29 और 19.9.11)। यह ज्ञान का लक्षण हुआ, अब ज्ञेय का स्वरूप बतलाते है -
— Lokmanya Tilak