मूल श्लोक
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
asaktiranabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu nityaṃ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭopapattiṣu
अनुवाद
(कर्म में) अनासक्ति , बाल-बच्चों और घर-गृहस्थी आदि में लम्पट न होना, इष्ट या अनिष्ट की प्राप्ति से चित्त की सर्वदा एक ही सी वृत्ति रखना,