भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १३.१० ·

English

मूल श्लोक

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

asaktiranabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu nityaṃ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭopapattiṣu

१३.१०अध्याय १३ · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३५ में से श्लोक १०

अनुवाद

(कर्म में) अनासक्ति , बाल-बच्चों और घर-गृहस्थी आदि में लम्पट न होना, इष्ट या अनिष्ट की प्राप्ति से चित्त की सर्वदा एक ही सी वृत्ति रखना,

— Lokmanya Tilak

अध्याय १३, श्लोक १३.१०