मूल श्लोक
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
indriyārtheṣu vairāgyamanahaṅkāra eva ca janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadoṣānudarśanam
अनुवाद
इन्द्रियों के विषयों में विराग, अहंकार-हीनता, और जन्म-मृत्यु-बुढ़ापा-व्याधि एवं दुःखों को (अपने पीछे लगे हुए) दोष-समझना;