मूल श्लोक
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
atha cittaṃ samādhātuṃ na śaknoṣi mayi sthiram abhyāsayogena tato māmicchāptuṃ dhanañjaya
अनुवाद
अब (इस प्रकार) मुझसे भली भाँति चित्त को स्थिर करते न बन पड़े तो हे धनंजय! अभ्यास की सहायता से अर्थात् बारंबार प्रयत्न करके मेरी प्राप्ति कर लेने की आशा रख।