भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ११.५४ ·

English

मूल श्लोक

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

bhaktyā tvananyayā śakya ahamevaṃvidho'rjuna jñātuṃ draṣṭuṃ ca tattvena praveṣṭuṃ ca parantapa

११.५४अध्याय ११ · विश्वरूपदर्शनयोग५५ में से श्लोक ५४

अनुवाद

हे अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति से ही इस प्रकार मेरा ज्ञान होना, मुझे देखना, और हे परन्तप! मुझमें तत्त्व से प्रवेश करना सम्भव है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

भक्ति करने से परमेश्वर का पहले ज्ञान होता है, और फिर अन्त में परमेश्वर के साथ उसका तादात्म्य हो जाता है। यही सिद्धान्त पहले 4.29 में और आगे 18.55 में फिर आया है। इसका खुलासा हमने गीतारहस्य के तेरहवें प्रकरण (पृ. 426 – 428) में किया है। अब अर्जुन को पूरी गीता के अर्थ का सार बतलाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ११, श्लोक ११.५४