मूल श्लोक
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
matkarmakṛnmatparamo madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ nirvairaḥ sarvabhūteṣu yaḥ sa māmeti pāṇḍava
अनुवाद
हे पांडव! जो इस बुद्धि से कर्म करता है, कि सब कर्म मेरे अर्थात् परमेश्वर के है, जो मत्परायण और संगविरहित है, और जो सब प्राणियों के विषय में निर्वैर है, वह मेरा भक्त मुझमें मिल जाता है।
टिप्पणी
उक्त श्लोक का आशय यह है, कि जगत के सब व्यवहार भगवद्भक्त को परमेश्वरार्पणबुद्धि से करना चाहिए (ऊपर 33 वाँ श्लोक देखो), अर्थात् उसे सारे व्यवहार इस निरभिमान बुद्धि से करना चाहिए, कि जगत के सभी कर्म परमेश्वर के है, सच्चा कर्ता और करानेवाला वही है; किन्तु हमें निमित्त बना कर वह ये कर्म हम से करवा रहा है; ऐसा करने से वे कर्म शान्ति अथवा मोह-प्राप्ति में बाधक नहीं होते। शांकरभाष्य में भी यही कहा है, कि इस श्लोक में पूरे गीताशास्त्र का तात्पर्य आ गया है। इससे प्रगट है, कि गीता का भक्तिमार्ग यह नहीं कहता कि आराम से 'राम-राम' जपा करो; प्रत्युत उसका कथन है, कि उत्कट भक्ति के साथ ही साथ उत्साह से सब निष्काम कर्म करते रहो। संन्यास-मार्गवाले कहते है, कि 'निर्वैर' का अर्थ निष्क्रिय है; परन्तु यह अर्थ यहाँ विवक्षित नहीं है, इसी बात को प्रगट करने के लिए उसके साथ 'मत्कर्मकृत' अर्थात् 'सब कर्मों के परमेश्वर के (अपने नहीं) समझ कर परमेश्वरार्पण बुद्धि से करनेवाला' विशेषण लगाया गया है। इस विषय का विस्तृत विचार गीतारहस्य के बारहवें प्रकरण (पृ. 390 – 397) में किया गया है।
— Lokmanya Tilak