मूल श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śrībhagavānuvāca sudurdarśamidaṃ rūpaṃ dṛṣṭavānasi yanmama devā apyasya rūpasya nityaṃ darśanakāṅkṣiṇaḥ
अनुवाद
श्रीभगवान ने कहा: मेरे जिस रूप को तू ने देखा है, इसका दर्शन मिलना बहुत कठिन है। देवता भी इस रूप को देखने की सदैव इच्छा किए रहते है।