मूल श्लोक
सञ्जय उवाच ।इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वास्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।आश्वासयामास च भीतमेनम्भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sañjaya uvāca ityarjunaṃ vāsudevastathoktvā svakaṃ rūpaṃ darśayāmāsa bhūyaḥ āśvāsayāmāsa ca bhītamenam bhūtvā punaḥ saumyavapurmahātmā
अनुवाद
संजय ने कहा: इस प्रकार भाषण करके वासुदेव ने अर्जुन को फिर अपना (पहले का) स्वरूप दिखलाया; और फिर सौम्य रूप धारण करके उस महात्मा ने डरे हुए अर्जुन को धीरज बँधाया।
टिप्पणी
गीता के द्वितीय अध्याय के 5 वें से 8 वें, 20 वें, 22 वें 29 वें, और 70 वें श्लोक, आठवें अध्याय के 9 वें, 10 वें, 11 वें और 28 वें श्लोक, नवें अध्याय के 20 और 21 वें श्लोक, पन्द्रहवें अध्याय के 2 रे से 5 वें और 15 वें श्लोक का छन्द विश्वरूप-वर्णन के उक्त 36 श्लोकों के छन्द के समान है; अर्थात् इसके प्रत्येक चरण में ग्यारह अक्षर हैं। परन्तु इनमें गणों का कोई एक नियम नहीं है, इससे कालिदास प्रभृति के काव्यों के इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उपजाति, दोधक, शालिनी आदि छन्दों की चाल पर ये श्लोक नहीं कहे जा सकते। अर्थात् यह वृतरचना आर्ष यानी वेदसंहिता के त्रिष्टुप् वृत्त के नमूने पर की गई है; इस कारण यह सिद्धान्त और भी सुदृढ़ हो जाता है, कि गीता बहुत ही प्राचीन होगी। देखो गीतारहस्य परिशिष्ट प्रकरण पृ. 516
— Lokmanya Tilak