मूल श्लोक
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठाः युद्ध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca jayadrathaṃ ca karṇaṃ tathā'nyānapi yodhavīrān mayā hatāṃstvaṃ jahi mā vyathiṣṭhāḥ yuddhyasva jetāsi raṇe sapatnān
अनुवाद
मैं द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा ऐसे ही अन्यान्य वीर योद्धाओं को (पहले ही) मार चुका हूँ; उन्हें तू मार; घबराना नहीं! युद्ध कर! तू युद्ध में शत्रुओं को जीतेगा।
टिप्पणी
सारांश, जब श्रीकृष्ण सन्धि के लिए गए थे, तब दुर्योधन को मेल की कोई भी बात सुनते न देख भीष्म ने श्रीकृष्ण से केवल शब्दों में कहा था, कि 'कालपक्कमिदं मन्ये सर्व क्षत्रं जनार्दन' (मभा॰ उ॰ 127.32) – ये सब क्षत्रिय कालपक्क हो गए हैं। उसी कथन का यह प्रत्यक्ष दृश्य श्रीकृष्ण ने अपने विश्वरूप से अर्जुन को दिखला दिया है (ऊपर 26 – 3 श्लोक देखो)। कर्मविपाक-प्रक्रिया का यह सिद्धान्त भी 33 वें श्लोक में आ गया है, कि दुष्ट मनुष्य अपने कर्मों से मरते हैं, उनको मारने वाला तो सिर्फ निमित्त है, इस लिए मारने वाले को उसका दोष नहीं लगता।
— Lokmanya Tilak