भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ११.३४ ·

English

मूल श्लोक

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठाः युद्ध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca jayadrathaṃ ca karṇaṃ tathā'nyānapi yodhavīrān mayā hatāṃstvaṃ jahi mā vyathiṣṭhāḥ yuddhyasva jetāsi raṇe sapatnān

११.३४अध्याय ११ · विश्वरूपदर्शनयोग५५ में से श्लोक ३४

अनुवाद

मैं द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा ऐसे ही अन्यान्य वीर योद्धाओं को (पहले ही) मार चुका हूँ; उन्हें तू मार; घबराना नहीं! युद्ध कर! तू युद्ध में शत्रुओं को जीतेगा।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

सारांश, जब श्रीकृष्ण सन्धि के लिए गए थे, तब दुर्योधन को मेल की कोई भी बात सुनते न देख भीष्म ने श्रीकृष्ण से केवल शब्दों में कहा था, कि 'कालपक्कमिदं मन्ये सर्व क्षत्रं जनार्दन' (मभा॰ उ॰ 127.32) – ये सब क्षत्रिय कालपक्क हो गए हैं। उसी कथन का यह प्रत्यक्ष दृश्य श्रीकृष्ण ने अपने विश्वरूप से अर्जुन को दिखला दिया है (ऊपर 26 – 3 श्लोक देखो)। कर्मविपाक-प्रक्रिया का यह सिद्धान्त भी 33 वें श्लोक में आ गया है, कि दुष्ट मनुष्य अपने कर्मों से मरते हैं, उनको मारने वाला तो सिर्फ निमित्त है, इस लिए मारने वाले को उसका दोष नहीं लगता।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ११, श्लोक ११.३४