मूल श्लोक
सञ्जय उवाच ।एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्यकृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णम्सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sañjaya uvāca etacchrutvā vacanaṃ keśavasya kṛtāñjalirvepamānaḥ kirīṭī namaskṛtvā bhūya evāha kṛṣṇam sagadgadaṃ bhītabhītaḥ praṇamya
अनुवाद
संजय ने कहा: केशव के इस भाषण को सुन कर अर्जुन अत्यन्त भयभीत हो गया, गला रुँध कर, काँपते-काँपते हाथ जोड़, नमस्कार करके उसने श्रीकृष्ण से नम्र होकर फिर कहा –