भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १०.६ ·

English

मूल श्लोक

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

maharṣayaḥ sapta pūrve catvāro manavastathā madbhāvā mānasā jātā yeṣāṃ loka imāḥ prajāḥ

१०.६अध्याय १० · विभूतियोग४२ में से श्लोक ६

अनुवाद

सात महर्षि, उनके पहले के चार, और मनु मेरे ही मानस, अर्थात् मन से निर्माण किए हुए, भाव हैं कि जिनसे (इस) लोक में यह प्रजा हुई है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

यद्यपि इस श्लोक के शब्द सरल है, तथापि जिन पौराणिक पुरुषों को उद्देश्य करके यह श्लोक कहा गया है, उनके सम्बन्ध से टीकाकारों में बहुत ही मतभेद है। विशेषतः अनेकों ने इसका निर्णय कई प्रकार से किया है कि 'पहले के' (पूर्वे) और 'चार' (चत्वारः) पदों का अन्वय किस पद से लगाना चाहिए। सात महर्षि प्रसिद्ध हैं, परन्तु ब्रह्मा के एक कल्प में चौदह मन्वन्तर (देखो गीतार॰ पृ. 193) होते हैं, और प्रत्येक मन्वन्तर के मनु, देवता एवं सप्तर्षि भिन्न-भिन्न होते हैं (देखो हरिवंश 1.7; विष्णु 3.1 और मत्स्य 9)। इसी से 'पहले के' शब्द को सात महर्षियों का विशेषण मान कई लोगों ने ऐसा अर्थ किया है, कि आज कल के अर्थात् वैवस्वत मन्वन्तर से पहले के चाक्षुष मन्वन्तर वाले सप्तर्षि यहाँ विवक्षित है। इस सप्तर्षियों ने नाम भृगु, नभ, विवस्वान्, सुधामा, विरजा, अतिनामा और सहिष्णु हैं। किन्तु हमारे मत में यह अर्थ ठीक नहीं है। क्योंकि आजकल के – वैवस्वत अथवा जिस मन्वन्तर में गीता कही गई है, उससे – पहले के मन्वन्तर वाले सप्तर्षियों को बतलाने की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है। अतः वर्तमान मन्वन्तर के ही सप्तर्षियों को लेना चाहिए। महाभारत-शान्तिपर्व के नारायणीयोपाख्यान में इनके ये नाम है – मरीचि, अंगिरस, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु और वसिष्ठ (मभा॰ शां॰ 335.28, 29; 380.64 और 65)। और हमारे मत से यहाँ पर ये ही विवक्षित हैं। क्योंकि गीता में नारायणीय अथवा भागवत-धर्म ही विधिसहित प्रतिपाद्य है (देखो गीतार॰ पृ.8 – 9)। तथापि यहाँ इतना बतला देना आवश्यक है, कि मरीचि आदि सप्तर्षियों के उक्त नामों में कहीं-कहीं अंगिरस के बदले भृगु का नाम पाया जाता है और कुछ स्थानों पर तो ऐसा वर्णन है कि कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ वर्तमान युग के सप्तर्षि है (विष्णु. 3.1.32 और 33; मत्स्य. 9.27 और 28; मभा॰ अनु॰ 93.21)। मरीचि आदि ऊपर लिखे हुए सात ऋषियों में ही भृगु और दक्ष को मिलाकर विष्णुपुराण (1.7.5,6) में नौ मानस पुत्रों का और इन्हीं में नारद को भी जोड़कर मनुस्मृति में ब्रह्मदेव के दस मानस पुत्रों का वर्णन है (मनु॰ 1.34, 35)। इस मरीचि आदि शब्दों की व्युत्पत्ति भारत में की गई है (मभा॰ अनु॰ 85)। परन्तु हमें अभी इतना ही देखना है, कि सात महर्षि कौन-कौन हैं, इस कारण इन नौ-दस मानस पुत्रों का, अथवा इनके नामों की व्युत्पत्ति का विचार करने की यहाँ आवश्यकता नहीं है। प्रगट है, कि 'पहले के' इस पद का अर्थ 'पूर्व मन्वन्तर के सात महर्षि' लगा नहीं सकते। अब देखना है कि 'पहले के चार' इन शब्दों को मनु का विशेषण मान कर कई एकों ने जो अर्थ किया है, वह कहाँ तक युक्तिसंगत है। कुछ चौदह मन्वन्तर हैं और इनके चौदह मनु है; इनसे सात-सात के दो वर्ग हैं। पहले सातों के नाम स्वायम्भुव, स्वारोचिष, औत्तमी, तामस, रैवत, चाक्षुष और वैवस्वत हैं, तथा ये स्वायम्भुव आदि मनु कहे जाते हैं (मनु॰ 1.62 और 63)। इनमें से छः मनु हो चुके और आज-कल सातवाँ अर्थात् वैवस्वत मनु चल रहा है। इसके समाप्त होने पर आगे जो सात मनु आवेंगे (भाग॰ 8.13.6) उनको सावर्णि मनु कहते हैं; उनके नाम सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि, और इन्द्रसावर्णि हैं (विष्णु॰ 3.2; भागवत 8.13, हरिवंश 1.7)। इस प्रकार, प्रत्येक मनु के सात-सात होने पर, कोई कारण नहीं बतलाया जा सकता, कि किसी भी वर्ग के 'पहले के चार' ही गीता में क्यों विवक्षित होंगे। ब्रह्माण्डपुराण (4.1) में कहा है, कि सावर्णि मनुओं में पहले मनु को छोड़कर अगले चार अर्थात् दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि और रुद्रसावर्णि एक ही समय में उत्पन्न हुए; और इसी आधार से कुछ लोग कहते है, कि यही चार सावर्णि मनु गीता में विवक्षित है। किन्तु इस पर दूसरा आक्षेप यह है कि ये सब सावर्णि मनु भविष्य में होनेवाले हैं, इस कारण यह भूतकाल-दर्शक अगला वाक्य 'जिनके इस श्लोक में यह प्रजा हुई' भावी सावर्णि मनुओं को लागू नहीं हो सकता। इसी प्रकार 'पहले के चार' शब्दों का सम्बन्ध 'मनु' पद से जोड़ देना ठीक नहीं है। अतएव कहना पड़ता है कि 'पहले के चार' ये दोनों शब्द स्वतन्त्र रीति से प्राचीन काल के कोई चार ऋषियों अथवा पुरुषों का बोध कराते है। और ऐसा मान लेने से यह प्रश्न सहज ही होता है, कि ये पहले के चार ऋषि या पुरुष कौन हैं? जिन टीकाकारों ने इस श्लोक का ऐसा अर्थ किया है, उनके मत में सनक, सनन्द, सनातन और सनत्कुमार (भाग॰ 3.12.4) ये ही वे चार ऋषि हैं। किन्तु इस अर्थ पर आक्षेप यह है कि यद्यपि ये चारों ऋषि ब्रह्मा के मानसपुत्र हैं, तथापि ये सभी जन्म से ही संन्यासी होने के कारण प्रजा-बुद्धि न करते थे और इससे ब्रह्मा इन पर क्रुद्ध हो गए थे (भाग॰ 3.12; विष्णु॰ 1.7)। अर्थात् यह वाक्य इन चार ऋषियों को बिलकुल ही उपयुक्त नहीं होता कि 'जिनसे इस लोक में यह प्रजा हुई' – येषां इमाः प्रजाः। इस के अतिरिक्त कुछ पुराणों में यद्यपि यह वर्णन है, कि ये चार ऋषि चार ही थे, तथापि भारत के नारायणीय अर्थात् भागवतधर्म में कहा है, कि इन चारों में सन, कपिल और सनत्सुजात को मिला लेने से जो सात ऋषि होते हैं, वे सब ब्रह्मा के मानस-पुत्र हैं और वे पहले से ही निवृत्तिधर्म के थे (मभा॰ शां॰ 340.67,68)। इस प्रकार सनक आदि ऋषियों को सात मान लेने से कोई कारण नहीं देख पड़ता, कि इनमें से चार ही क्यों लिए जाएँ। फिर 'पहले के चार' हैं कौन? हमारे मत में इस प्रश्न का उत्तर नारायणीय अथवा भागवत धर्म की पौराणिक कथा से ही दिया जाना चाहिए। क्योंकि यह निर्विवाद है, कि गीता में भागवतधर्म ही का प्रतिपादन किया गया है। अब यदि यह देखें कि भागवतधर्म में सृष्टि की उत्पत्ति की कल्पना किस प्रकार की थी, तो पता लगेगा कि मरीचि आदि सात ऋषियों के पहले वासुदेव (आत्मा), संकर्षण (जीव), प्रद्युम्न (मन), और अनिरुद्ध (अहंकार) ये चार मूर्तियाँ उत्पन्न हो गई थीं; और कहा है, कि इनमें से पिछले अनिरुद्ध से अर्थात् अहंकार से या ब्रह्मदेव से मरीचि आदि पुत्र उत्पन्न हुए (मभा॰ शां॰ 339.34 – 40 और 60 – 72; 340.27 – 31)। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध इन्हीं चार मूर्तियों को 'चतुर्व्यूह' कहते हैं; और भागवतधर्म के एक पन्थ का मत है, कि ये चारों मूर्तियाँ स्वतन्त्र थीं तथा दूसरे कुछ लोक इनमें से तीन अथवा दो को ही प्रधान मानते हैं। किन्तु भगवद्गीता को ये कल्पनाएँ मान्य नहीं हैं। हमने गीतारहस्य (पृ. 195 और 537 – 538) में दिखलाया है, कि गीता एकव्यूह-पन्थ की है, अर्थात् एक ही परमेश्वर से चतुर्व्यूह आदि सब कुछ की उत्पत्ति मानती है। अतः व्यूहात्मक वासुदेव आदि मूर्तियों को स्वतन्त्र न मान कर इस श्लोक में दर्शाया है, कि ये चारों व्यूह एक ही परमेश्वर अर्थात् सर्व्यापी वासुदेव के (गी॰ 7.19) 'भाव' है। इस दृष्टि से देखने पर विदित होगा, कि भागवतधर्म के अनुसार 'पहले के चार' इन शब्दों का उपयोग वासुदेव आदि चतुर्व्यूह के लिए किया गया है कि जो सप्तर्षियों के पूर्व उत्पन्न हुए थे। भारत में ही लिखा है, कि भागवतधर्म के चतुर्व्यूह आदि भेद पहले से ही प्रचलित थे (मभा॰ शां॰ 348.57); यह कल्पना कुछ हमारी ही नई नहीं है। सारांश, भारतान्तर्गत नारायणीयाख्यान के अनुसार हमने इस श्लोक का अर्थ यों लगाया है - 'सात महर्षि' अर्थात् मरीचि आदि, 'पहले के चार' अर्थात् वासुदेव आदि चतुर्व्यूह और 'मनु' अर्थात् जो उस समय से पहले हो चुके थे और वर्तमान, सब मिला कर स्वायम्भुव आदि सात मनु। अनिरुद्ध अर्थात् अहंकार आदि चार मूर्तियों को परमेश्वर के पुत्र मानने की कल्पना भारत में और अन्य स्थानों में भी पाई जाती है (देखो मभा॰ शां॰ 311.7 – 8) परमेश्वर के भावों का वर्णन हो चुका; अब बतलाते है, कि इन्हें जान करके उपासना करने से क्या फल मिलता है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १०, श्लोक १०.६