भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १०.५ ·

English

मूल श्लोक

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo'yaśaḥ bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ

१०.५अध्याय १० · विभूतियोग४२ में से श्लोक ५

अनुवाद

अहिंसा, समता, तुष्टि (सन्तोष), तप, दान, यश और अयश आदि अनेक प्रकार के प्राणिमात्र के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

'भाव' शब्द का अर्थ है 'अवस्था,' 'स्थिति' या 'वृत्ति' और सांख्यशास्त्र में 'बुद्धि के भाव' एवं 'शारीरिक भाव' ऐसा भेद किया गया है। सांख्यशास्त्री पुरुष को अकर्ता और बुद्धि को प्रकृति का एक विकार मानते हैं, इसलिए वे कहते हैं, कि लिंगशरीर में रहने वाली बुद्धि की विभिन्न अवस्थाएँ अथवा भाव ही है (देखो गीतार॰ पृ. 191 और सां॰ का॰ 40 – 55); और ऊपर के दो श्लोकों में इन्हीं भावों का वर्णन है। परन्तु वेदान्तियों का सिद्धान्त है, कि प्रकृति और पुरुष से भी परे परमात्मारूपी एक नित्य तत्त्व है और (नासदीय सूक्त के वर्णनानुसार) उसी के मन में सृष्टि निर्माण करने की इच्छा उत्पन्न होने पर सारा दृश्य जगत उत्पन्न होता है; इस कारण वेदान्तशास्त्र में भी कहा है, कि सृष्टि के मायात्मक सभी पदार्थ परब्रह्म के मानस भाव है (अगला श्लोक देखो)। तप, दान और यज्ञ आदि शब्दों से तन्निष्ठक बुद्धि के भाव ही उद्दिष्ट हैं। भगवान और कहते है कि –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १०, श्लोक १०.५