मूल श्लोक
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
bṛhatsāma tathā sāmnāṃ gāyatrī chandasāmaham māsānāṃ mārgaśīrṣo'hamṛtūnāṃ kusumākaraḥ
अनुवाद
साम अर्थात् गाने के योग्य वैदिक स्तोत्रों में बृहत्साम, (और) शब्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ; मैं महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसन्त हूँ।
टिप्पणी
महीनों में मार्गशीष को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया है, कि उन दिनों में बारह महीनों को मार्गशीर्ष से ही गिनने की रीति थी, जैसे कि आजकल चैत्र से है – (देखो मभा॰ अनु॰ 106 और 109; एवं वाल्मीकि रामायण 3.16)। भागवत 11.16.27 में भी ऐसा ही उल्लेख है। हमने अपने 'ओरायन' ग्रन्थ में लिखा है, कि मृगशीर्ष नक्षत्र को अग्रहायणी अथवा वर्षारम्भ का नक्षत्र करते थे; जब मृगादि नक्षत्र-गणना का प्रचार था तब मृग-नक्षत्र को प्रथम अग्रस्थान मिला, और इसी से फिर मार्गशीर्ष महीने को भी श्रेष्ठता मिली होगी। इस विषय को यहाँ विस्तार के भय से अधिक बढ़ाना उचित नहीं है।
— Lokmanya Tilak