मूल श्लोक
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
mṛtyuḥ sarvaharaścāhamudbhavaśca bhaviṣyatām kīrtiḥ śrīrvākca nārīṇāṃ smṛtirmedhā dhṛtiḥ kṣamā
अनुवाद
सबका क्षय करने वाली मृत्यु और आगे जन्म लेने वालों का उत्पत्तिस्थान मैं हूँ, स्त्रियों में कीर्ति, श्री और वाणी, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूँ।
टिप्पणी
कीर्ति, श्री, वाणी इत्यादि शब्दों से वही देवता विवक्षित हैं। महाभारत (आदि. 66.13 – 14) में वर्णन है, कि इनमें से वाणी और क्षमा को छोड़कर शेष पाँच, और दूसरी पाँच (पुष्टि , श्रद्धा, क्रिया, लज्जा और मति) दोनों मिल कर कुल दसों दक्ष की कन्याएँ है। धर्म के साथ ब्याही जाने के कारण इन्हें धर्मपत्नी कहते है।
— Lokmanya Tilak