मूल श्लोक
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sargāṇāmādirantaśca madhyaṃ caivāhamarjuna adhyātmavidyā vidyānāṃ vādaḥ pravadatāmaham
अनुवाद
हे अर्जुन! सृष्टि मात्र का आदि, अन्त और मध्य भी मैं हूँ, विद्याओं में अध्यात्मविद्या और वाद करनेवालों का वाद मैं हूँ।
टिप्पणी
पीछे 20 वें श्लोक में बतला दिया है, कि सचेतन भूतों का आदि, मध्य और अन्त मैं हूँ तथा अब कहते हैं, कि सब चराचर सृष्टि का आदि, मध्य और अन्त मैं हूँ; यही भेद है।
— Lokmanya Tilak