भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १०.१८ ·

English

मूल श्लोक

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śṛṇvato nāsti me'mṛtam

१०.१८अध्याय १० · विभूतियोग४२ में से श्लोक १८

अनुवाद

हे जनार्दन! अपनी विभूति और योग मुझे फिर विस्तार से बतलाओ; क्योंकि अमृततुल्य (तुम्हारे भाषण को) सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं होती।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

विभूति और योग, दोनों शब्द इसी अध्याय के सातवें श्लोक में आए हैं और यहाँ अर्जुन ने उन्हीं को दुहरा दिया है। 'योग' शब्द का अर्थ पहले (गी॰ 7.25) दिया जा चुका है, उसे देखो। भगवान् की विभूतियों को अर्जुन इसलिए नहीं पूछता, कि भिन्न-भिन्न विभूतियों का ध्यान देवता समझ कर किया जावें; किन्तु सत्रहवें श्लोक के इस कथन को स्मरण रखना चाहिए, कि उक्त विभूतियों में सर्व्यापी परमेश्वर की ही भावना रखने के लिए उन्हें पूछा है। क्योंकि भगवान यह पहले ही बतला आए हैं (गी॰ 7.20 – 25, 9.22 – 28) कि एक ही परमेश्वर को सब स्थानों में विद्यमान जानना एक बात है, और परमेश्वर की अनेक विभूतियों को भिन्न-भिन्न देवता मानना दूसरी बात है; इन दोनों में भक्तिमार्ग की दृष्टि से महान अन्तर है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय १०, श्लोक १०.१८