मूल श्लोक
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
kathaṃ vidyāmahaṃ yogiṃstvāṃ sadā paricintayan keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo'si bhagavanmayā
अनुवाद
हे योगिन! (मुझे यह बतलाइए कि ) सदा तुम्हारा चिन्तन करता हुआ मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ? और हे भगवन्! मैं किन-किन पदार्थों में तुम्हारा चिन्तन करूँ?