मूल श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śrībhagavānuvāca hanta te kathayiṣyāmi divyā hyātmavibhūtayaḥ prādhānyataḥ kuruśreṣṭha nāstyanto vistarasya me
अनुवाद
श्रीभगवान ने कहा: अच्छा; तो अब हे कुरुश्रेष्ठl अपनी दिव्य विभूतियों में से तुम्हें मुख्य-मुख्य बतलाता हूँ, क्योंकि मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।
टिप्पणी
इस विभूति-वर्णन के समान ही अनुशासनपर्व (14.311 – 321) में और अनुगीता (अश्व॰ 43 और 44) में परमेश्वर के रूप का वर्णन है। परन्तु गीता का वर्णन उसकी अपेक्षा अधिक सरस है, इस कारण इसी का अनुकरण और स्थलों में भी मिलता है। उदाहरणार्थ, भागवतपुराण के एकादश स्कन्ध के सोलहवें अध्याय में, इसी प्रकार का विभूति-वर्णन भगवान ने उद्धव को समझाया है; और वहीं आरम्भ में (भाग॰ 11.16.6 – 8) कह दिया गया है, कि यह वर्णन गीता के इस अध्याय वाले वर्णन के अनुसार है।
— Lokmanya Tilak