मूल श्लोक
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
kathaṃ na jñeyamasmābhiḥ pāpādasmānnivartitum kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhirjanārdana
अनुवाद
तथापि, हे जनार्दन! कुलक्षय का दोष हमें स्पष्ट देख पड़ रहा है, अतः उस पाप से परांमुख होने की बात हमारे मन में आवे बिना कैसे रहेगी?
टिप्पणी
प्रथम से ही यह प्रत्यक्ष हो जाने पर, कि युद्ध में गुरुवध, सुहृद्वध और कुलक्षय होगा, लड़ाई-सम्बन्धी अपने कर्तव्य के विषय में अर्जुन को जो व्यामोह हुआ, उसकी क्या बीज है? गीता में जो आगे प्रतिपादन है, उससे इसका क्या सम्बन्ध है? और इस दृष्टि से प्रथमाध्याय का कौन-सा महत्त्व है? इन सब प्रश्नों का विचार गीतारहस्य के पहले और फिर चौदहवें प्रकरण में हमने किया है, उसे देखो। इस स्थान पर ऐसी साधारण युक्तियों का उल्लेख किया गया है जैसे, लोभ से बुद्धि नष्ट हो जाने के लिए दुष्टों को अपनी दुष्टता जान न पड़ती हो, तो चतुर पुरुषों को दुष्टों के फन्दे में पड़कर दुष्ट न होना चाहिए – न पापे प्रतिपापः स्यात् – उन्हें चुप रहना चाहिए। इस साधारण युक्तियों का ऐसे प्रसंग पर कहाँ तक उपयोग किया जा सकता है, अथवा करना चाहिए? – यह भी ऊपर के समान ही एक महत्त्व का प्रश्न है, और इसका गीता के अनुसार जो उत्तर है, उसका हमने गीतारहस्य के बारहवें प्रकरण में निरूपण किया है। गीता के अगले अध्यायों में जो विवेचन है, वह अर्जुन की उन शंकाओं की निवृत्ति करने के लिए है, कि जो उसे पहले अध्याय में हुई थी; इस बात पर ध्यान दिए रहने से गीता का तात्पर्य समझने में किसी प्रकार का सन्देह नहीं रह जाता। भारतीय युद्ध में एक ही राष्ट्र और धर्म के लोगों में फूट हो गई थी और वे परस्पर मरने-मारने पर उतारू हो गए थे। इसी कारण से उक्त शंकाएँ उत्पन्न हुई है। अर्वाचीन इतिहास में जहाँ-जहाँ ऐसे प्रसंग आए हैं, वहाँ-वहाँ ऐसे ही प्रश्न उपस्थित हुए है। अस्तु; आगे कुलक्षय से जो-जो अनर्थ होते हैं, उन्हें अर्जुन स्पष्ट कर कहता है।
— Lokmanya Tilak