मूल श्लोक
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
tasmānnārhā vayaṃ hantuṃ dhārtarāṣṭrānsvabāndhavān svajanaṃ hi kathaṃ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava
अनुवाद
इसलिए हमें अपने ही बान्धव कौरवों को मारना उचित नहीं है; क्योंकि हे माधव! स्वजनों को मार कर हम सुखी क्योंकर होंगे?
टिप्पणी
अग्नि दो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः। क्षेत्रदाराहरश्चैव षडेते आततायिनः॥ (वसिष्ठस्मृ. 3.16) अर्थात् घर जलाने के लिए आया हुआ, विष देनेवाला, हाथ में हथियार लेकर मारे के लिए आया हुआ, धन लूटकर ले जाने वाला और स्त्री या खेत का हरणकर्ता – ये छः आततायी हैं। मनु ने भी कहा है कि इन दुष्टों को बेधड़क जान से मार डाले, इसमें कोई पातक नहीं है (मन. 8.350,351)
— Lokmanya Tilak